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संविधान के अनुच्छेद 351 में यह अधिकथित है कि :-
"संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्त का माध्यम बन सके ..... ।"
7 जून, 1955 की श्री बी. जी. खेर की अध्यक्षता में जो राजभाषा आयोग नियुक्त किया गया था उसने अपनी रिपोर्ट में पृष्ठ 175 पर यह सिफारिश की :-
"विधि और विधि निर्माण के क्षेत्र में भाषा के माध्यम का परिवर्तन पूरा करने के लिए उसमें निम्न प्रारंभिक कार्य आवश्यक जान पढ़ते हैं :-
(1) एक प्रामाणिक विधिक-शब्दकोष;
(2) केंद्र और राज्य दोनों की विधियों का, हिंदी में पुनर्निर्माण और पुनर्ग्रंथन करना ।"
2. राजभाषा आयोग की सिफारिश को स्वीकार करते हुए संसदीय राजभाषा समिति (1958) ने अपनी रिपोर्ट में, पृष्ठ 28-29 पर, यह सिफारिश की :
"कार्य की जटिलता को ध्यान में रखते हुए, समिति का यह विचार है कि विधि शब्दावली और शब्द संग्रहों के तैयार किए जाने और कानूनों के हिंदी में अनुवाद से संबंधित संपूर्ण कार्यक्रम की समुचित योजना बनाने और उसके कार्यान्वयन के लिए ऐसे स्थायी आयोग का गठन करना उपयुक्त होगा जो भारत की विभिन्न राष्ट्रीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले विधि विशेषज्ञों से मिलकर बने ।"
3. राष्ट्रपति ने, संविधान के अनुच्छेद 344 के खंड (6) द्वारा उन्हें प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, समिति की रिपोर्ट पर विचार किया और तत्पश्चात् 27 अप्रैल, 1960 को एक राष्ट्रपति आदेश जारी किया गया ।
4. आदेश के पैरा 13 में निम्नलिखित निदेश था :
"समिति के सुझाव को दृष्टि में रखकर विधि मंत्रालय (यथासंभव सब भारतीय भाषाओं में प्रयोग के लिए) सर्वमान्य विधि शब्दावली की तैयारी और संविधियों के हिंदी में अनुवाद संबंधी पूरा काम के लिए समुचित योजना बनाने और पूरा करने के लिए विधि विशेषज्ञों वाले एक स्थायी आयोग या अन्य समिचित अभिकरण का निर्माण करे "।
5. राष्ट्रपति द्वारा 27 अप्रैल, 1960 को जारी कए गए निदेश के अनुसरण में, विधि मंत्रालय ने राजभाषा (विधायी) आयोग का गठन किया । आयोग को निम्नलिखित कार्य सौंपे गए थे :
(i) यथासंभव सभी राजभाषाओं में प्रयोग के लिए एक प्रामाणिक विधि शब्दावली तैयार करना और उसे प्रकाशित करना ;
(ii) सभी केंद्रीय अधिनियमों और राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों और विनियमों के हिंदी में प्राधिकृत पाठ तैयार करना ;
(iii) किसी केंद्रीय अधिनियम या राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित किसी अध्यादेश या विनियम के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा बनाए गए सभी नियमों, विनियमों और आदेशों के प्राधिकृत हिंदी पाठ तैयार करना ;
(iv) केंद्रीय अधिनियमों और राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों और विनियमों का राज्यों की अपनी-अपनी राजभाषाओं में अनुवाद और किसी भी राज्य में पारित अधिनियमों और प्रखअयापित अध्यादेशों के उस सूरत में जिसमें कि ऐसे अधिनियमों या अध्यादेशों के पाठ हिंदी से भिन्न भाषा में हैं, हिंदी में अनुवाद कराने का प्रबंध करना ; और
(v) अन्य ऐसे कर्तव्यों का पालन करना जो समय-समय पर भारत सरकार द्वारा सौंपे जाएं ।
आयोग ने केंद्रीय अधिनियमों के हिंदी और अन्य भाषाओं में अनुवाद का सूक्ष्म कार्य आरंभ किया । उसने पारिभाषिक और विधि शब्दों के हिंदी पर्यायों का एक संकलन भी 1970 में प्रकाशित किया जिसका नाम "विधि शब्दावली" था । इसमें लगभग 10,000 प्रविष्टियां थीं । आयोग ने अधिकांश बड़े-बड़े अधिनियमों का, जैसे कि भारतीय दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, भारतीय संविदा अधिनियम, सिविल प्रक्रिया संहिता, आदि का हिंदी में अनुवाद तैयार किया और उनका राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 5(1)(क) के अधीन हिंदी में उनके प्राधिकृत पाठ का प्रकाशन किया ।
तदुपरांत सरकार ने इस कार्य को विभाग में ही कराने का निश्चय किया और उसे स्थायी आधार प्रदान किया । इसी दृष्टि से आयोग समाप्त कर दिया गया और विधायी विभाग के भाग के रूप में राजभाषा खंड का सृजन किया गया । वे सभी कृत्य जो पहले आयोग को सौंपे गए थे, राजभाषा खंड को सौंप दिए गए । यह कार्य 1 अक्तूबर, 1976 से किया गया ।

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